दलितों के मंदिर प्रवेश से लेकर नेहरू को दी चुनौती तक — आधुनिक बिहार के निर्माता की कहानी
चुनावी माहौल में PollPulse India लाया है — बिहार के 10 चर्चित मुख्यमंत्रियों की कहानी।
पहले एपिसोड में आज कहानी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह उर्फ श्रीबाबू की…
एक ऐसे नेता की, जिसने गांधी की बात भी नहीं मानी —
और 17 साल तक बिहार की राजनीति पर अपनी मुहर लगाए रखी।
दलितों के साथ मंदिर में — पंडों से भिड़ गए CM
1953 की बात है।
विनोबा भावे भूदान आंदोलन के दौरान देवघर के बैद्यनाथ धाम पहुंचे।
उन्हें बताया गया कि दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता।
विनोबा जी ने दलितों के साथ मंदिर जाने का ऐलान किया।
पंडों ने विरोध किया, धक्का-मुक्की तक हो गई।
मामला सरकार तक पहुंचा।
तब मुख्यमंत्री श्रीबाबू ने कहा —
“अगर दलितों को रोका गया, तो मैं खुद उनके साथ मंदिर जाऊंगा।”
27 सितंबर 1953 को वे 700 दलितों के साथ बैद्यनाथ मंदिर पहुंचे।
पुलिस सुरक्षा में पूजा की, और उस दिन बिहार के मंदिरों से जाति की दीवार गिर गई।
यही था श्रीबाबू का असली गांधीवाद — कर्म में, नारे में नहीं।
राजा जॉर्ज पंचम से मुंह मोड़ने वाला लड़का
21 अक्टूबर 1887, नवादा के खनवा गांव में जन्मे श्रीकृष्ण सिंह मुंगेर जिले के माउर गांव के रहने वाले थे।
पिता हरिहर सिंह जमींदार थे, पर बेटे के भीतर विद्रोह था।
1911 में किंग जॉर्ज पंचम पटना आए।
पूरा शहर सजाया गया, लेकिन श्रीकृष्ण ने खुद को कमरे में बंद कर लिया।
“जिसे देखने लोग जा रहे हैं, वही हमारा मालिक है — मैं उसे नहीं देखूंगा।”
उन्होंने दरवाजे तक बंद कर लिए ताकि उनकी नजर उस राजा पर न पड़े।
यहीं से उनमें आजादी का बीज अंकुरित हुआ।
गंगा किनारे गीता और कृपाण की कसम
कॉलेज के दिनों में वे लोकमान्य तिलक और अरविंद घोष के अखबार पढ़ते थे — ‘मराठा’ और ‘वंदे मातरम’।
इतिहासकार नरेंद्र पांडेय लिखते हैं —
“वे गंगा में खड़े होकर एक हाथ में गीता और दूसरे में कृपाण लेकर बोले —
देशसेवा से नहीं हटूंगा, चाहे प्राण क्यों न चले जाएं।”
गांधी की मर्जी के खिलाफ मुख्यमंत्री बने
1937 में बिहार में पहला विधानसभा चुनाव हुआ।
कांग्रेस को बहुमत मिला, लेकिन अंग्रेजों ने मोहम्मद यूनुस को प्रधानमंत्री (तब CM को Premier कहा जाता था) बना दिया।
कांग्रेस ने विरोध किया, यूनुस हटे।
अब बारी थी विधायक दल का नेता चुनने की।
गांधीजी चाहते थे अनुग्रह नारायण सिंह को।
लेकिन पटना की बैठक में सर गणेश दत्त बोले —
“अनुग्रह क्यों, श्रीबाबू क्यों नहीं?”
अनुग्रह बाबू ने खुद श्रीबाबू का नाम आगे कर दिया।
और इस तरह गांधी की इच्छा के उलट, श्रीबाबू बिहार के पहले प्रधानमंत्री बने।
यहीं से बिहार की सियासत का नया अध्याय शुरू हुआ।
नेहरू का साथ, राष्ट्रपति का विरोध
1952 में जब देशभर में चुनाव हुए,
कांग्रेस ने बिहार की 331 में से 235 सीटें जीतीं।
अब टकराव था — श्रीबाबू बनाम अनुग्रह बाबू।
नेहरू श्रीबाबू के पक्ष में थे,
जबकि राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अनुग्रह नारायण के साथ।
आखिर नेहरू ने समझौता करवाया —
श्रीबाबू CM बने, अनुग्रह बाबू डिप्टी CM और वित्त मंत्री।
राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, दोनों के बीच भरोसे की डोर बनी रही।
धुर विरोधी से गले मिलकर रो पड़े
1957 का चुनाव — कांग्रेस की फिर जीत।
इस बार अनुग्रह बाबू ने सीधा दावा ठोक दिया, लेकिन श्रीबाबू ने पहले ही 70 टिकट कटवा दिए —
ज्यादातर अनुग्रह समर्थक।
वोटिंग में श्रीबाबू को 145 वोट मिले, अनुग्रह बाबू को 109।
जीत के बाद श्रीबाबू अपने घर पहुंचे — जश्न शुरू ही हुआ था कि खबर आई,
“अनुग्रह बाबू आ रहे हैं।”
वे फौरन नीचे उतरे, गले मिले, दोनों रो पड़े।
“देखो अनुग्रह, अब इस अदावत को यहीं खत्म करो।”
इतनी भावनात्मक राजनीति — आज की पीढ़ी सोच भी नहीं सकती।
ईमानदारी ऐसी कि बेटे को टिकट नहीं दिया
1957 में जब उनके बेटे शिवशंकर सिंह को टिकट दिलाने की बात चली,
श्रीबाबू ने कहा —
“अगर मेरा बेटा लड़ेगा, तो मैं नहीं। एक परिवार से एक ही व्यक्ति।”
वे खुद अपने लिए वोट मांगने नहीं जाते थे।
कहते थे —
“अगर मैंने काम किया है, तो जनता खुद वोट देगी।”
इंसुलिन लगाकर रसगुल्ले खाते थे
उनके परपोते अनिल कुमार सिन्हा बताते हैं —
“बाबा खाने के शौकीन थे। इंसुलिन का इंजेक्शन लगाकर रसगुल्ले खाते थे।
मुजफ्फरपुर या बेगूसराय जाते तो पहले अरहर की दाल बनवाने का संदेश भेज देते।”
नेहरू से बोले — ‘फैक्ट्री नहीं लगी तो इस्तीफा दूंगा’
श्रीबाबू चाहते थे कि बिहार में उद्योग लगें।
लेकिन नेहरू ने प्लांट दूसरे राज्यों को दे दिए।
श्रीबाबू भड़क गए — अनशन पर बैठ गए।
कहा —
“बिहार में फैक्ट्री नहीं लगी, तो मैं इस्तीफा दूंगा।”
आखिर नेहरू को झुकना पड़ा —
बरौनी रिफाइनरी और फर्टिलाइज़र फैक्ट्री की नींव रखी गई।
कहा जाता है, पूरे भारत में सिर्फ दो CM थे जो नेहरू को “तुम” कहते थे —
बिधान चंद्र रॉय और श्रीबाबू।
17 साल में बदला बिहार का चेहरा
उनके शासन में बिहार बदला — सचमुच बदला।
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बोकारो में स्टील प्लांट
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बरौनी में डेयरी और रिफाइनरी
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हटिया में हैवी इंडस्ट्री
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गढ़हरा में एशिया का सबसे बड़ा रेलवे यार्ड
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पूसा, सबौर और रांची में एग्रीकल्चर कॉलेज
इसलिए लोग उन्हें “आधुनिक बिहार का निर्माता” कहते हैं।
मरते वक्त तिजोरी में निकले सिर्फ ₹24,500
31 जनवरी 1961 को श्रीबाबू का निधन हुआ।
12 दिन बाद जब उनकी तिजोरी खोली गई —
चार लिफाफे मिले।
पहले में बिहार कांग्रेस के लिए ₹20,000
दूसरे में दोस्त की बेटी की शादी के लिए ₹3,000
तीसरे में एक मंत्री की बेटी के लिए ₹1,000
और चौथे में नौकर के लिए ₹500
बस इतना।
एक नेता जिसने करोड़ों का विकास किया, पर खुद के पास सिर्फ 24,500 थे।
1937 में खुद घटाई थी सैलरी
सीनियर जर्नलिस्ट संतोष सिंह लिखते हैं —
“जब वे बिहार के प्रधानमंत्री थे, मंत्रियों की सैलरी ₹5,000 थी।
श्रीबाबू ने इसे घटाकर ₹500 कर दिया।”
निष्कर्ष — बिहार केसरी, जिसने गांधी की भी नहीं सुनी
श्रीकृष्ण सिंह सिर्फ नेता नहीं थे,
वे बिहार की आत्मा थे।
उन्होंने दलितों को हक दिलाया, उद्योग बसाए,
और राजनीति में ईमानदारी की मिसाल कायम की।
‘मुख्यमंत्री’ सीरीज के दूसरे एपिसोड में कल यानी 23 सितंबर को पढ़िए, देखिए और सुनिए…
बिहार के ऐसे मुख्यमंत्री की कहानी, जिन्हें शपथ लेने के महज 10 महीने बाद एक आदिवासी कंडक्टर के कारण कुर्सी छोड़नी पड़ी।